उत्तराखंड में मदरसा शिक्षकों को वेतन न देने पर सचिव अल्पसंख्यक कल्याण को फिर अवमानना नोटिस………

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्राथमिक मदरसों में स्पेशल स्कीम के तहत नियुक्त शिक्षकों को वर्ष 2016 से नियमित वेतन और अन्य देयकों का भुगतान नहीं किए जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने पूर्व आदेशों का पालन न होने पर सचिव अल्पसंख्यक कल्याण (Minority Welfare) को दोबारा अवमानना नोटिस जारी करते हुए 11 अगस्त 2026 तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ में हुई। अदालत ने अगली सुनवाई की तिथि 11 अगस्त निर्धारित की है।

हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद नहीं हुआ भुगतान
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि वर्ष 2023 में हाईकोर्ट ने अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के सचिव को तीन सदस्यीय समिति गठित कर चार माह के भीतर शिक्षकों के दस्तावेजों की जांच करने और उनके लंबित देयकों का भुगतान करने के निर्देश दिए थे।

हालांकि, न्यायालय के आदेश के बावजूद न तो समिति का गठन किया गया और न ही शिक्षकों को उनका बकाया वेतन और अन्य देयक दिए गए।

2016 से वेतन के लिए भटक रहे शिक्षक
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी संजय और अन्य शिक्षकों ने अवमानना याचिका दायर कर बताया कि उन्हें वर्ष 2006 से 2008 के बीच प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्पेशल स्कीम के तहत विभिन्न मदरसों में नियुक्त किया गया था।

याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2016 के बाद से उन्हें नियमित वेतन नहीं मिला और अन्य देयकों का भुगतान भी रोक दिया गया। इससे शिक्षकों और उनके परिवारों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

पहले भी जारी हो चुके हैं नोटिस
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि इसी मुद्दे से जुड़े अन्य अवमानना मामलों में भी सचिव अल्पसंख्यक कल्याण को नोटिस जारी किए जा चुके हैं, लेकिन अब तक किसी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है।

इस पर हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एक बार फिर नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

11 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
अब सभी की निगाहें 11 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत यह जानना चाहती है कि उसके पूर्व आदेशों का पालन क्यों नहीं किया गया और मदरसा शिक्षकों को लंबित वेतन एवं अन्य देयकों का भुगतान अब तक क्यों नहीं हुआ।

मामले को लेकर शिक्षकों में उम्मीद जगी है कि न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद वर्षों से लंबित वेतन भुगतान का रास्ता साफ हो सकता है।

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