उत्तराखंड में 4 फीट 9 इंच से छोटे खिलाड़ी, 78 साल पुरानी परंपरा, नैनीताल में आजादी के दिन खेला जाता है अनोखा फुटबॉल टूर्नामेंट…….
नैनीताल: देश की आजादी के साथ 1947 में नैनीताल में शुरू हुई फुटबॉल की एक अनोखी परंपरा आज 78 साल बाद भी जारी है. एच.एन. पांडे मेमोरियल इंडिपेंडेंस डे चिल्ड्रेन फुटबॉल टूर्नामेंट में 4 फीट 9 इंच से छोटे बच्चे मैदान में उतरते हैं. 15 अगस्त को होने वाला फाइनल खेल, तिरंगे और शहरवासियों के उत्साह के बीच एक खास उत्सव में बदल जाता है।
भारत जब 1947 में आजादी का जश्न मना रहा था, उसी दौर में नैनीताल में फुटबॉल की एक ऐसी परंपरा शुरू हुई, जो सात दशक से ज्यादा समय बाद भी लोगों के दिलों में जिंदा है। एच.एन. पांडे मेमोरियल इंडिपेंडेंस डे चिल्ड्रेन फुटबॉल टूर्नामेंट आज 78 साल पूरे कर चुका है और इसे अपनी तरह के देश के अनोखे बाल फुटबॉल आयोजनों में गिना जाता है।
इस प्रतियोगिता की सबसे खास शर्त खिलाड़ियों की लंबाई है। इसमें 4 फीट 9 इंच से कम कद वाले बच्चे ही मैदान पर उतर सकते हैं। मैदान में छोटे-छोटे खिलाड़ी जब गेंद के पीछे दौड़ते हैं तो उनका जोश देखने लायक होता है। कद भले छोटा हो, लेकिन इन बच्चों के सपने और खेल को लेकर जुनून किसी बड़े खिलाड़ी से कम नहीं दिखाई देता।
1947 में शुरू हुआ यह आयोजन अब आठवें दशक में पहुंच चुका है. इन वर्षों में कई पीढ़ियों ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। नैनीताल के कई बच्चों ने इसी मैदान से अपने फुटबॉल सफर की शुरुआत की और आगे बढ़े। इस आयोजन ने शहर की खेल संस्कृति को भी अपनी अलग पहचान दिलाई है।
15 अगस्त को होता है खास फाइनल।
इस टूर्नामेंट की सबसे आकर्षक परंपरा इसका फाइनल मुकाबला है, जो हर साल देश के स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त को खेला जाता है. तिरंगे की मौजूदगी में नन्हे खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं और फुटबॉल के रोमांच के साथ आजादी का उत्सव भी मनाते हैं।
फाइनल देखने के लिए नैनीताल के अलग-अलग वर्गों के लोग मैदान में पहुंचते हैं। दर्शकों की भीड़, हर गोल पर गूंजती तालियां और खिलाड़ियों का उत्साह माहौल को किसी बड़े खेल आयोजन जैसा बना देता है। बच्चों की आंखों में जीत की चमक और मैदान पर उनका संघर्ष इस मुकाबले को खास बनाता है।
यही वजह है कि यह केवल खेल प्रतियोगिता नहीं रह गई है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाला फाइनल नैनीताल के लोगों के लिए एक सामुदायिक उत्सव का रूप ले चुका है, जहां खेल, देशभक्ति और स्थानीय विरासत एक साथ दिखाई देते हैं।
एच.एन. पांडे की स्मृति में नाम।
इस प्रतियोगिता का आयोजन सीआरएसटीसी ओल्ड बॉयज़ एसोसिएशन करता है। इसका नाम नैनीताल के वरिष्ठ खेलप्रेमी और खेलों को प्रोत्साहित करने वाले एच.एन. पांडे की स्मृति में रखा गया है। आयोजन की लंबी यात्रा खेल के प्रति उनके योगदान और शहर की सामूहिक भावना को भी सामने लाती है।
सत्तर और अस्सी के दशक में यह टूर्नामेंट अपने चरम पर रहा। समय के साथ खेल की गुणवत्ता और परिस्थितियों में बदलाव आया, लेकिन प्रतियोगिता के प्रति स्थानीय लोगों का लगाव कम नहीं हुआ। आयोजक लगातार कोशिश करते रहे हैं कि बच्चों को ऐसा मंच मिले, जहां वे अपनी प्रतिभा को पहचान सकें और उसे बेहतर बना सकें।
इस आयोजन का उद्देश्य सिर्फ एक विजेता चुनना नहीं है. इसके जरिए कम उम्र के खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धा का अनुभव मिलता है, उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें फुटबॉल को गंभीरता से आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।
नन्हे कदम, बड़े सपने।
78 साल बाद भी नैनीताल के इस टूर्नामेंट की तस्वीर काफी हद तक वही है। 4 फीट 9 इंच से छोटे बच्चे, पैरों में फुटबॉल और आंखों में बड़े सपने लेकर मैदान पर उतरते हैं। उनके लिए यह केवल मैच नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा दिखाने और आगे बढ़ने का अवसर भी है। बता दें कि 2 साल (2020 और 2021) कोविड की वजह से टूर्नामेंट नहीं हुआ।
वहीं, कई दशकों से चली आ रही यह परंपरा अलग-अलग पीढ़ियों को एक साथ जोड़ती रही है। जिन बच्चों ने कभी इस मैदान पर खेला, उनके बाद नई पीढ़ियां उसी आयोजन का हिस्सा बनीं। इस तरह फुटबॉल के साथ जुड़ी यह विरासत लगातार आगे बढ़ती रही।
15 अगस्त को जब तिरंगे की छांव में इस प्रतियोगिता का फाइनल खेला जाता है, तब नैनीताल में आजादी का उत्सव और फुटबॉल का जुनून एक ही मैदान पर नजर आता है। यही इस 78 साल पुरानी परंपरा की सबसे बड़ी खासियत है, जिसने खेल को पीढ़ियों की साझा विरासत बना दिया है।

