खबर जरा हटके: बीटेक कंप्यूटर साइंस में फर्स्ट डिवीजन पास करने के बाद भी नौकरी न मिलने पर एक युवा रैपिडो चलाने को मजबूर है……..

दिल्ली: जब कोई युवा इंजीनियरिंग की डिग्री लेता है, तो उसकी आंखों में एक शानदार भविष्य के सपने पलने लगते हैं। एक अच्छी नौकरी, बढ़िया पैकेज और जिंदगी में कुछ कर गुजरने का जुनून… लेकिन असल जिंदगी की सच्चाई कई बार इन किताबी सपनों से कोसों दूर होती है। आज का जॉब मार्केट नए ग्रेजुएट्स को एक ऐसा तगड़ा झटका दे रहा है, जहां अच्छे नंबर और शानदार डिग्रियां भी पहली नौकरी की कोई गारंटी नहीं रह गई हैं। जरा सोचिए, उस नौजवान के दिल पर क्या बीतती होगी जो पूरी उम्मीद के साथ सैकड़ों कंपनियों के दरवाजे खटखटाता है लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आता और सिर्फ एक खामोशी छा जाती है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इन दिनों एक ऐसी ही कहानी तेजी से वायरल हो रही है, जिसने इंटरनेट पर एक नई बहस छेड़ दी है। यह कहानी एक ऐसे रैपिडो राइडर की है, जिसने कंप्यूटर साइंस में फर्स्ट डिवीजन के साथ ग्रेजुएशन किया है, लेकिन आज वो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए शहर के ट्रैफिक में बाइक दौड़ा रहा है।

ट्रैफिक जाम में शुरू हुई एक गहरी बातचीत
इस दिल छू लेने वाले किस्से को एक्स के यूजर नीरज ने शेयर किया है। नीरज ने बताया कि उन्होंने हाल ही में एक रैपिडो बुक की थी। सफर के दौरान उनकी नजर राइडर के हेलमेट पर पड़ी, जिस पर एक कॉलेज का जाना-पहचाना स्टिकर लगा हुआ था। ट्रैफिक जाम में फंसे होने की वजह से दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई। यह महज 10 मिनट की एक आम सी गुफ्तगू थी, लेकिन इसमें आज के युवाओं की बेरोजगारी और उनके अनकहे संघर्ष की एक बहुत गहरी दास्तान छिपी थी।

नीरज ने अपनी पोस्ट में लिखा, “पिछले हफ्ते मेरी मुलाकात रैपिडो पर एक लड़के से हुई। मैंने उसके हेलमेट पर लगे कॉलेज के स्टिकर को पहचाना और ट्रैफिक में फंसे होने के दौरान हमारी करीब 10 मिनट बात हुई। बातों ही बातों में पता चला कि उसने इसी साल कंप्यूटर साइंस में फर्स्ट डिवीजन से अपनी डिग्री पूरी की है।”

500 से ज्यादा अर्जियां
कंप्यूटर साइंस और वो भी फर्स्ट डिवीजन! आमतौर पर लोगों को लगता है कि ऐसी प्रोफाइल वाले बच्चों को तो टेक कंपनियां पलकों पर बिठा लेती हैं। लेकिन इस नौजवान की हकीकत इस मुगालते से बिल्कुल अलग थी। कॉलेज खत्म होने के बाद से ही वो लगातार नौकरियों के लिए हाथ-पैर मार रहा था, लेकिन किस्मत ने जैसे सारे दरवाजे बंद कर लिए हों। इस युवा के हालात बयां करते हुए नीरज आगे लिखते हैं, “डिग्री मिलने के दो महीने बाद ही, आज वो लड़का हर सुबह 6 बजे उठकर रैपिडो की राइड्स ले रहा है। उसकी सारी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है। उसने करीब 500 से भी ज्यादा कंपनियों में अपनी सीवी भेजी, लेकिन कहीं से कोई कॉल वापस नहीं आई। सच कहूं तो उसने अब गिनती भी भुला दी है कि वो कितनी जगह अप्लाई कर चुका है।”

घरवालों से छुपाया कड़वा सच
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक कर देने वाला पहलू वो है, जो घर की चार दीवारों के भीतर चल रहा है। उस लड़के के माता-पिता अब भी यही सोच रहे हैं कि उनका होनहार बेटा घर पर बैठकर बड़ी टेक कंपनियों के इंटरव्यू की तैयारी कर रहा है। लड़के ने नीरज को बताया कि उसने कभी अपने घरवालों के सामने इस सच्चाई का जिक्र ही नहीं किया। उसे समझ नहीं आता कि वो इस बात को घर वालों के सामने कैसे रखे। वो नहीं चाहता कि घर में इस बात का कोई बतंगड़ बने या उसके माता-पिता बेकार की टेंशन लें। इसलिए वो चुपचाप हर सुबह घर से अपनी बाइक निकालता है और शहर की भागती-दौड़ती सड़कों पर निकल पड़ता है, ताकि अपनी जेब का खर्च खुद उठा सके।

नीरज के मुताबिक, सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उस लड़के के लहजे में कोई खास गुस्सा या हताशा नजर नहीं आ रही थी। वो इसे लेकर कोई ड्रामा नहीं कर रहा था। वो इस कड़वी सच्चाई को बिल्कुल वैसे ही कुबूल कर चुका था, जैसे आज के दौर में कई और फ्रेशर्स चुपचाप सह रहे हैं।

नीरज ने अपनी पोस्ट में इस बात पर जोर देते हुए कहा, “वो इस बारे में बात करते हुए बिल्कुल भी ड्रामेटिक नहीं हो रहा था। वो बस बार-बार यही कह रहा था कि आजकल का मार्केट ही ऐसा है। वो अपनी बाइक ऐसे चलाता रहा, जैसे ये सब उसके लिए बहुत नॉर्मल सी बात हो चुकी हो।”

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