उत्तराखंड में तीन जिलों के मरीजों का सहारा, खुद बदहाल: नौगांव सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों से लेकर दवाओं तक का संकट…….

नौगांव: रवांई क्षेत्र के प्रमुख सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) नौगांव में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का मुद्दा एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

तीन जिलों से बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचने वाले इस अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों, जरूरी स्टाफ, जांच सुविधाओं और मूलभूत संसाधनों की कमी मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है।

सवाल यह है कि जब यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से इतना प्रभावशाली माना जाता है, तो स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में नौगांव सीएचसी लगातार उपेक्षा का शिकार क्यों है?

स्थानीय लोगों के अनुसार सीएचसी में फिजिशियन, सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और हड्डी रोग विशेषज्ञ जैसे महत्वपूर्ण विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव है। ऐसे में गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद बड़े अस्पतालों के लिए रेफर करना मजबूरी बन जाता है।

पहाड़ी क्षेत्रों में जहां एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक पहुंचने में कई घंटे लग जाते हैं, वहां समय पर विशेषज्ञ उपचार नहीं मिलना मरीज की परेशानी को और बढ़ा देता है।

अल्ट्रासाउंड सुविधा भी नियमित नहीं
अस्पताल में उपलब्ध अल्ट्रासाउंड सुविधा के सुचारू रूप से संचालित नहीं होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। गर्भवती महिलाओं, पेट संबंधी बीमारी और अन्य जांचों के लिए मरीजों को बार-बार अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते हैं या निजी केंद्रों का रुख करना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए निजी जांच का खर्च अतिरिक्त बोझ बन जाता है।

चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का भी संकट
अस्पताल में चिकित्सकों के साथ-साथ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की कमी भी व्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही है। अस्पताल जैसे संस्थान में सफाई, मरीजों की सहायता, वार्ड व्यवस्था और अन्य दैनिक कार्यों के लिए पर्याप्त सहायक स्टाफ जरूरी है। कर्मचारियों की कमी का सीधा असर अस्पताल की कार्यप्रणाली और मरीजों की सुविधाओं पर पड़ता है।

जर्जर आवासीय भवनों से भी खतरा
सीएचसी परिसर में स्वास्थ्य विभाग के आवासीय भवनों की स्थिति भी चिंता का विषय बताई जा रही है। जर्जर भवन न केवल कर्मचारियों के लिए असुरक्षित हैं, बल्कि इससे सरकारी आवासीय परिसंपत्तियों के रखरखाव पर भी सवाल खड़े होते हैं। यदि समय रहते इन भवनों का जीर्णोद्धार या पुनर्निर्माण नहीं किया गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

एंबुलेंस और दवाओं की उपलब्धता पर सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल में पर्याप्त एंबुलेंस सुविधा का अभाव भी गंभीर मरीजों के लिए बड़ी समस्या है। पहाड़ में सड़क की दूरी और यातायात की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए एंबुलेंस स्वास्थ्य व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। इसके अलावा आवश्यक जीवनरक्षक और सामान्य दवाओं की नियमित उपलब्धता नहीं होने की शिकायतें भी सामने आती हैं। मरीजों को बाहर से दवा खरीदने के लिए मजबूर होना पड़े तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की उपयोगिता पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।

तीन जिलों के मरीजों का दबाव, सुविधाएं सीमित
सीएचसी नौगांव केवल स्थानीय आबादी के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। रवांई और यमुना घाटी के विस्तृत क्षेत्र के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी मरीज यहां उपचार के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि तीन जिलों तक के लोग इस स्वास्थ्य केंद्र पर निर्भर हैं। इसके बावजूद अस्पताल की सुविधाओं और मानव संसाधन में अपेक्षित विस्तार नहीं हो पाया है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व मजबूत, फिर स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर क्यों?
स्थानीय लोगों का सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका को लेकर है। रवांई क्षेत्र और यमुना घाटी से सरकार में तीन राज्य मंत्री, दो विधायक तथा जिला संगठन का नेतृत्व करने वाला प्रतिनिधित्व होने के बावजूद क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था अपेक्षित स्तर तक क्यों नहीं पहुंच पाई, यह सवाल लगातार उठ रहा है।

लोगों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधि सामूहिक रूप से पहल करें तो सीएचसी नौगांव को विशेषज्ञ चिकित्सकों, पर्याप्त पैरामेडिकल एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों, नियमित जांच सुविधाओं, एंबुलेंस और दवाओं की उपलब्धता के मामले में मजबूत किया जा सकता है। इसके लिए केवल घोषणाओं के बजाय बजट, पदों की स्वीकृति और नियमित निगरानी की आवश्यकता है।

आखिर जिम्मेदार कौन?
स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली के लिए केवल चिकित्सकों या अस्पताल कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग, शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों—सभी की जवाबदेही तय किए जाने की जरूरत है। जहां पद स्वीकृत नहीं हैं, वहां पद सृजन कौन करेगा? जहां डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं, वहां नियुक्ति की जिम्मेदारी किसकी है? अल्ट्रासाउंड सुविधा नियमित क्यों नहीं चल रही, दवाओं की आपूर्ति में कमी क्यों आती है और एंबुलेंस की व्यवस्था क्यों पर्याप्त नहीं है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब जनता को मिलना चाहिए।

पहाड़ में इलाज भी अधिकार है, एहसान नहीं
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा केवल सरकारी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। यदि किसी गंभीर मरीज को विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध न हो, जांच के लिए दूसरे शहर जाना पड़े या एंबुलेंस के अभाव में समय गंवाना पड़े, तो इसका खामियाजा मरीज और उसका परिवार भुगतता है।

नौगांव सीएचसी की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस व्यापक सवाल को सामने लाती है कि क्या पहाड़ के लोगों को भी मैदानी क्षेत्रों के समान गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं?

स्थानीय जनता अब आश्वासनों के बजाय ठोस कार्रवाई चाहती है। अस्पताल में रिक्त पदों को भरने, विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती, अल्ट्रासाउंड सेवा को नियमित करने, पर्याप्त एंबुलेंस उपलब्ध कराने, आवश्यक दवाओं की निर्बाध आपूर्ति, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की नियुक्ति तथा जर्जर आवासीय भवनों के पुनर्निर्माण की मांग तेज हो रही है।

सवाल सिर्फ नौगांव सीएचसी का नहीं, बल्कि पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है। आखिर कब तक दूर-दराज के मरीज इलाज के लिए रेफरल, निजी अस्पताल और लंबी यात्राओं के भरोसे रहेंगे? और सबसे बड़ा सवाल—क्या जिम्मेदार तंत्र पहाड़ की जिंदगी को भी उतनी ही गंभीरता से लेगा, जितनी मैदानी क्षेत्रों की स्वास्थ्य जरूरतों को।

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