उत्तराखंड स्वरोजगार योजना से पहाड़ों में युवाओं के सपने साकार, बन रहे उद्यमी…….

देहरादून: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोकने और स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से संचालित ‘मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना’ धरातल पर एक बड़ी आर्थिक क्रांति का रूप ले चुकी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार इस योजना के जरिए न सिर्फ युवाओं को खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय और नीतिगत सहायता दे रही है, बल्कि उन्हें रोजगार मांगने वाले से रोजगार देने वाला (उद्यमी) बना रही है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में इस योजना के सफल क्रियान्वयन से ग्रामीण आर्थिकी को एक नई मजबूती मिली है।

मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य के शिक्षित बेरोजगारों, प्रवासियों और महिलाओं को स्थानीय स्तर पर व्यवसाय के अवसर देना है। इस योजना के तहत आवेदक अनिवार्य रूप से उत्तराखंड का स्थायी निवासी होना चाहिए। आवेदक की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। सामान्य परियोजनाओं के लिए किसी विशेष शैक्षणिक योग्यता की बाध्यता नहीं है, जिससे समाज के हर वर्ग तक इसका लाभ पहुंच सके। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के उद्योगों के लिए अधिकतम₹25 लाख और सर्विस सेक्टर के लिए अधिकतम ₹10 लाख तक के प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जाती है। एमएसएमई नीति के तहत वर्गीकृत श्रेणियों (A, B, C, D) के आधार पर परियोजना लागत का 15% से 25% तक का मार्जिन मनी (अनुदान) सरकार द्वारा दिया जाता है।

पर्वतीय जिलों में सफलता की नई गूंज
राज्य के उद्योग विभाग से मिले हालिया आंकड़ों के अनुसार, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना का सबसे बेहतरीन और प्रभावी असर उत्तराखंड के पर्वतीय और सीमांत जिलों में देखने को मिला है। यह योजना चमोली, अल्मोड़ा, पौड़ी गढ़वाल, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जिलों में सबसे सफल साबित हुई है। इन जिलों में युवाओं ने पारंपरिक कृषि से हटकर आधुनिक डेयरी फार्मिंग, बेकरी उद्योग, होमस्टे (पर्यटन), रेडीमेड गारमेंट्स, मशरूम उत्पादन और कंप्यूटर सेवा केंद्रों जैसे उद्यम स्थापित किए हैं। सुगम बैंक लोन प्रक्रिया और जिला उद्योग केंद्रों (DIC) द्वारा दिए गए व्यावहारिक मार्गदर्शन के कारण इन जिलों में सफलता की दर 85 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है।

इस योजना ने किस तरह जमीनी स्तर पर लोगों का जीवन बदला है, इसे सफल लाभार्थियों के अनुभवों से समझा जा सकता है। होमस्टे और साहसिक पर्यटन से जुड़े चमोली जिले के जोशीमठ के संदीप नेगी ने कहा कि महामारी के बाद जब मैं दिल्ली की एक निजी नौकरी छोड़कर वापस अपने गांव लौटा, तो भविष्य को लेकर बहुत चिंतित था। तब मुझे मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के बारे में पता चला। मैंने चमोली उद्योग केंद्र के सहयोग से ₹8 लाख का लोन लिया और अपने पुराने पहाड़ी घर को एक खूबसूरत होमस्टे में बदला। आज मेरे होमस्टे में देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। मुझे सरकार से ₹2 लाख की सब्सिडी भी मिली। अब मैं न सिर्फ अपने परिवार का भरण-पोषण अच्छे से कर रहा हूँ, बल्कि गांव के दो अन्य युवाओं को भी रोजगार दे रखा है।

अल्मोड़ा के हवलबाग की रहने वाली दीपा देवी बेकरी एवं फूड प्रोसेसिंग से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए पहाड़ों में खुद का काम शुरू करना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत मुझे बिना किसी कड़े झंझट के ₹5 लाख का लोन मिल गया। मैंने स्थानीय अनाजों (जैसे मडुआ और झंगोरा) के बिस्कुट और नमकीन बनाने का छोटा सा प्लांट लगाया है। हमारे उत्पाद अब अल्मोड़ा के स्थानीय बाजारों के साथ-साथ देहरादून तक जा रहे हैं। इस योजना ने मुझे अपने पैरों पर खड़ा होने का आत्मविश्वास दिया है। अब हमारे समूह की अन्य महिलाएं भी इस योजना से जुड़ने की तैयारी कर रही हैं।

पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार के रहने वाले राजेश थपलियाल ने कहा कि मैं हमेशा से खुद का गारमेंट बिज़नेस करना चाहता था, लेकिन पूंजी की कमी थी। MSY योजना के तहत मैंने ₹15 लाख के प्रोजेक्ट की स्वीकृति ली। सरकार की त्वरित प्रक्रिया के कारण बैंक से लोन समय पर मिल गया। आज मेरी वर्कशॉप में स्कूल यूनिफॉर्म और स्थानीय रेडीमेड कपड़े तैयार होते हैं। पहाड़ों में इस तरह के उद्योगों के लिए बहुत संभावनाएं हैं, बस युवाओं को सही दिशा में कदम बढ़ाने की जरूरत है। सरकार की यह योजना हम जैसे युवाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

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