उत्तराखंड में अब बढ़ती महंगाई और कम वेतन की मार से देहरादून में सुलगने लगा श्रमिक आंदोलन, बोले- 11000 में क्या-क्या करें……

देहरादून: लगातार आसमान छूती महंगाई और सालों से न बढ़ी तनख्वाह को लेकर मजदूरों में आक्रोश देखा जा रहा है. मई के महीने में जब पूरी दुनिया मजदूर दिवस मनाकर देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में श्रमिकों के योगदान को याद करती है, तब उत्तराखंड की राजधानी में इन कामगारों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होना पड़ रहा है।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के औद्योगिक क्षेत्रों में इन दिनों मजदूरों का आक्रोश चरम पर है. सेलाकुई इंडस्ट्रियल एरिया के बाद अब देहरादून के मोहब्बेवाला स्थित एक दवा निर्माता कंपनी के बाहर भी भारी संख्या में औद्योगिक मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर मोर्चा खोल दिया है. अपनी गाढ़ी कमाई और दिन-रात की कड़ी मेहनत के बदले ये श्रमिक न्यूनतम वेतन को 12 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रति माह करने की मांग कर रहे हैं।

मई के महीने में जब पूरी दुनिया मजदूर दिवस मनाकर देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में श्रमिकों के योगदान को याद करती है, तब उत्तराखंड की राजधानी में इन कामगारों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होना पड़ रहा है।

3 हजार का सिलेंडर, 5 हजार का रूम रेंट
इस आंदोलन की मुख्य वजह आसमान छूती महंगाई और सालों से न बढ़ी तनख्वाह है। प्रदर्शनकारी मजदूरों का कहना है कि खाद्यान्न से लेकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार उछाल आ रहा है. बच्चों की पढ़ाई की फीस से लेकर बुजुर्गों की दवाइयों तक के खर्च ने निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों का जीना मुहाल कर दिया है. फैक्ट्री वर्कर्स ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि आज के दौर में 2500 से 3000 रुपये का सिलेंडर, 4 से 5 हजार रुपये कमरे का किराया और बच्चों की फीस के बाद 10-12 हजार रुपये की सैलरी में पूरे महीने का गुजारा करना पूरी तरह असंभव हो चुका है।

मजदूरों को करना पड़ रहा संघर्ष
सरकार की ओर से भी लेबर लॉ को लेकर मंथन चल रहा है, लेकिन धरातल पर मजदूरों को आज भी अपने हक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. इस आर्थिक संकट ने उन प्रवासी मजदूरों की कमर सबसे ज्यादा तोड़ दी है जो दूसरे राज्यों से आकर देहरादून में किराए के कमरों में रह रहे हैं. कुछ बाहरी मजदूरों को मजबूरी में 200 रुपये प्रति किलो से भी अधिक की महंगी दर पर छोटा सिलेंडर (छोटू सिलेंडर) खरीदना पड़ रहा है।

घर खर्च और रोजमर्रा की जरुरतों को पूरा करने के बाद उनके पास भविष्य के लिए एक रुपया भी नहीं बच पाता है. इसके अलावा आंदोलन में शामिल महिला कामगारों ने ठेकेदारों द्वारा परेशान और प्रताड़ित किए जाने के भी गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे कार्यक्षेत्र में उनके शोषण और असुरक्षा की बात सामने आ रही है।

देहरादून में फैक्ट्री मजदूरों में उबाल
देहरादून में श्रमिकों का यह असंतोष अब सिर्फ शांतिपूर्ण धरने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कुछ जगहों पर इसने हिंसक रूप भी अख्तियार कर लिया है. प्रशासन को मिली जानकारी के अनुसार, सेलाकुई की लाइटानियम टेक्नोलॉजी, डिक्सन टेक्नोलॉजी और ग्लोबल मेडिकोस जैसी प्रमुख कंपनियों के कर्मचारी वेतन वृद्धि के लिए लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. इस दौरान कुछ औद्योगिक इकाइयों के बाहर असंतोष बढ़ने के चलते पथराव और तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आई हैं. इन हिंसक झड़पों ने औद्योगिक क्षेत्रों में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

प्रशासन का शख्त कदम, लिया एक्शन
वहीं बिगड़ते हालात को देखते हुए जिला प्रशासन ने तुरंत सख्त कदम उठाया. देहरादून के जिलाधिकारी ने सेलाकुई और सिडकुल जैसे संवेदनशील औद्योगिक क्षेत्रों में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए तत्काल प्रभाव से बीएनएसएस की धारा-163 लागू कर दी है. इस आदेश के तहत पांच या उससे अधिक लोगों के एक जगह जमा होने बिना अनुमति रैलियां निकालने, हथियार या पत्थर इकट्ठा करने और लाउडस्पीकर बजाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है. जिलाधिकारी ने आम जनता से किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है और चेतावनी दी है कि इन पाबंदियों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी रूप से सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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