उत्तराखंड की धरती पर फूलों की कालीन से सजी फूलों की घाटी, ब्रह्मकमल और कस्तूरी मृग का दीदार………
उत्तरकाशी: यह वही मौसम है जब धरती के एक कोने पर फूलों की कालीन बिछ जाती हैं. यहां ऐसे-ऐसे दुर्लभ फूल खिलते हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं है. ब्रह्म कमल जैसे दुर्लभ और पवित्र फूल से लेकर कस्तूरी मृग तक का दीदार आप इसी मौसम में कर सकते हैं। इस जगह का नाम है वैली ऑफ फ्लावर्स जो विश्व धरोहर की सूची में शामिल है। इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में कुछ सुकून के पल बिताना चाहते हैं तो हम आपको सलाह देंगे एक-दो दिन आप उत्तराखंड की सबसे हसीन वादियों में ठहर जाइए। यहां जाने और ठहरने का पूरा ब्यौरा यहां जान लीजिए।
11000 फुट की ऊंचाई पर चारों तरफ का पहाड़ बरसात का इंतजार कर रहा है. बारिश की बूँदों का स्पर्श पाते ही यह धरा हरी-भरी चादर ओढ़ लेती है। हवा में मखमली महक और रूपसी आभा तैरने लगती है। इन गंगनचुंबी पहाड़ों पर जहां तक आपकी नजर जाएगी वहां चारों ओर घुंघराले, रंग-बिरंगे फूलों की सजीली बगिया आपका मन मोह लेगी। जी हां, वैली ऑफ फ्लावर्स के मनमोहक दुनिया में आपका स्वागत है। उत्तराखंड के चमौली जिले में स्थित फूलों की घाटी इसलिए सिर्फ जुलाई से सितंबर के बीच खुलती है। क्योंकि बरसात के आगमन से फूलों की घाटी जीवंत हो उठती है। पहाड़ों के आंचल में खिले ये अनगिनत कुसुम प्रकृति की सजीली चित्रकारी से लगते हैं। बादलों का घूंघट और कल-कल बहते झरने इस सुरम्य दृश्य में अलौकिक सौंदर्य भरते हैं। क्या आप इस दुनिया का आनंद नहीं उठाना चाहेंगे। तो आइए आज हम आपको चमौली के इस विश्व धरोहर के बारे में सारी जानकारी दे रहे हैं।
धरती पर यूनिक खूबसूरती
पहले जानते हैं धरती के इस स्वर्ग की भौगोलिक स्थित क्या है। फूलों की घाटी पश्चिमी हिमालय क्षेत्र की जास्कर और ग्रेटर हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा एक दुर्लभ अल्पाइन बेसिन है. इसके दो हिस्से हैं, चमोली जिले में स्थित 87 वर्गकिलोमीटर में फैला फूलो की घाटी और दूसरा हिस्सा नंदा देवी नेशनल पार्क। ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रांक एस स्मिथ ने 1931 में इस घाटी की जब पहली बार खोज की थी तो चारों ओर हर तरफ हजारों तरह के फूलों के देखकर विस्मृत हो गए। उसी समय उन्होंने कहा कि यह तो साक्षात फूलों की घाटी है। आज भी फूलों की घाटी में 600 से ज्यादा दुर्लभ फूलों की किस्में इस मौसम में उगती है जो और कहीं नहीं मिलेंगे। इनमें ऑर्किड की दुर्लभ किस्म, पॉपीज, प्रिमुलस जैसे फूल हैं। यहीं पर ब्रह्म कमल है। जब आप वैली ऑफ फ्लावर की ट्रैकिंग करेंगे तो इतने तरह के फूल आपको दिखेंगे जो जीवन में और कहीं नहीं देखे होंगे। इतना ही नहीं यहीं पर आपको कस्तुरी मृग, दुर्लभ लंगूर और लाल रंग वाला लोमड़ी भी मिलेगी। वहीं तितलियों का तो यहां बहार है. हजारों तरह की तितलियां इन फूलों पर आपको मंडराते हुए मिल जाएंगे।
वैली ऑफ फ्लावर्स है कहां
वैली ऑफ फ्लावर चमौली जिले में स्थित है। दिल्ली से आप पहले देहरादून जाएं। वहां से जोशीमठ होते हुए गोविंदघाट जाना होगा। यह दूरी करीब 310 किलोमीटर का है और इसमें 8 से 10 घंटे का समय लगेगा। गोविंदघाट से आपको घांघड़िया गांव जाना होगा। यह गांव भारत के सबसे आखिर का बसेरा है। यहां से आपको ट्रैक करना होगा। घांघड़िया से वैली ऑफ फ्लावर्स महज 4 किलोमीटर की दूरी पर है जो 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। ट्रेन से सबसे नजदीक ऋषिकेष से है जहां से गोविंदघाट की दूरी 273 किलोमीटर है। अगर आप हवाई मार्ग से जाना चाहते हैं तो आपको दिल्ली से पंतनगर एयरपोर्ट पर उतरना होगा। पंतनगर एयरपोर्ट से वैली ऑफ फ्लावर्स की दूरी 120 किलोमीटर के आसपास है। वहीं यदि आप देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे पर उतरते है तो वहां से वैली ऑफ फ्लावर्स की दूरी 300 किलोमीटर के आसपास होगी।
वैली ऑफ फ्लावर्स में क्या-क्या घूमें
वैली ऑफ फ्लावर्स में जहां जाएंगे वहां आपको प्रकृति की खूबसूरती देखने को मिलेगी। हर तरफ आपको कुछ न कुछ नया मिलेगा। वैली ऑफ फ्लावर्स पर जब आप ट्रैक कर जाएंगे तो आपको ऐसा लगेगा कि सारे फूल स्वर्ग से उतरकर यहीं इठला रही है। ढलानदार बुग्यालों वाली यह भौगोलिक बनावट मानसून में अनगिनत प्राकृतिक झरनों और रंग-बिरंगे दुर्लभ फूलों के खिलने के लिए आदर्श पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करती है। इन फूलों के अलावा भी यहां कई चीजें देख सकते हैं।
वैली ऑफ फ्लावर्स के आस-पास क्या है
वैली ऑफ फ्लावर्स के आसपास आपको हेमकुंड साहिब का दर्शन होगा। इसके साथ जोशीमठ यहीं है। वहीं उत्तराखंड में तिब्बत से सटा देश का सबसे आखिरी गांव माना भी यहीं है। अगर आप नंदा देवी नेशनल पार्क जाना चाहते हैं तो यहां से महज 40-50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां भी आपको मनोरम दृश्य देखने को मिलेंगे। हेमकुंड ताल भी यहीं पर स्थित है। इसके अलावा आप बेहद खूबसूरत गांवों को भी देख सकते हैं।

