उत्तराखंड में ‘थोड़ी बारिश होते ही भागने के लिए तैयार रहते हैं’, सहस्त्रधारा के पास बसे व्यापारियों का डर, जानिए क्या कुछ कहा……..
देहरादून: आज कुछ ही महीनों बाद सहस्त्रधारा एक बार फिर पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार हो उठा है. यह कहानी सिर्फ एक पर्यटन स्थल के दोबारा जी उठने की नहीं है, बल्कि यहां के स्थानीय लोगों के अदम्य साहस और जीने की जिद्द की है।
सितम्बर 2025 की वह खौफनाक रात देहरादून के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सहस्त्रधारा के इतिहास में एक काले अध्याय की तरह दर्ज है। भारी जलस्तर और प्रकृति के रौद्र रूप ने पलभर में यहां के स्थानीय व्यापारियों के आशियाने और दुकानें तिनके की तरह बहा दिए थे। तबाही का मंजर ऐसा था जिसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था। लेकिन आज कुछ ही महीनों बाद सहस्त्रधारा एक बार फिर पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार हो उठा है। यह कहानी सिर्फ एक पर्यटन स्थल के दोबारा जी उठने की नहीं है, बल्कि यहां के स्थानीय लोगों के अदम्य साहस और जीने की जिद्द की है।
पर्यटन सीजन की शुरुआत के साथ ही व्यापारी अपनी टूटी हुई उम्मीदों को समेटकर दोबारा दुकानों पर लौट आए हैं. उनके सामने सबसे बड़ा सवाल अपनी और अपने परिवार की रोजी-रोटी का है. व्यापारियों का दर्द और मजबूरी उनके इन शब्दों में साफ झलकती है, ‘हम यहां दुकान न लगाएं तो कहां जाएं, परिवार पालन के लिए यह जरूरी है। हमारे पास इसके अलावा कोई और सहारा नहीं है।
सामान के साथ सुरक्षित स्थानों तक भागने को तैयार
यहां के व्यापारियों के दिलों में उस ‘कयामत की रात’ का खौफ आज भी जिंदा है। जब भी आसमान में काले बादल घिरते हैं या थोड़ी भी बारिश होती है, तो दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि वह मंजर आज भी डराता है, इसलिए अब वे हर वक्त अलर्ट रहते हैं। जरा बारिश होते ही वे अपने सामान के साथ सुरक्षित स्थानों की ओर भागने को तैयार रहते हैं.
फिर पटरी पर लौटने लगा व्यापारियों का कारोबार
देहरादून के व्यापारी राजेंद्र प्रसाद कोठारी ने कहा कि सितंबर 2025 में जैसी आपदा उन्होंने देखी, वैसे कभी भी ऐसा मंजर नहीं देखा, क्योंकि वह बरसात के दिनों में भी यहीं रहते थे और गांव नहीं जाया करते थे। उन्होंने कहा कि लोग हमें कह रहे हैं फिर दोबारा इस नदी के किनारे बस गए हैं, फिर दुकान लगाने लगे हैं, लेकिन हमें ही पता है कि घर परिवार चलाने के लिए काम करना पड़ता है।
सरकार और संगठनों से मिली मदद
उन्होंने कहा कि आपदा में पूरा मार्केट बह गया था, लेकिन टूरिस्ट सीजन आने तक एक बार फिर इसे डेवलप किया गया। उन्होंने बताया कि आपदा के बाद थोड़ी बहुत सरकार और संगठनों से मदद मिली थी। उन्होंने बताया कि इस बाजार से कई लोग बह भी गए, लेकिन परिवार का भरण-पोषण करने के लिए हमारे पास और कोई तरीका नहीं है। यही दुकान है, जिससे परिवार का पालन पोषण होता है. उन्होंने कहा कि 50 साल की उम्र में उन्होंने ऐसा कभी नहीं देखा।
रघुवीर ने कहा कि उनका आपदा में 12 लाख का नुकसान हो गया था, दुकान के साथ-साथ उनका सारा सामान भी बह गया था। उन्होंने कहा कि एक बार जिंदगी को दोबारा शुरू करने के लिए हमने मार्च से फिर अपनी दुकान लगानी शुरू की थी, अब फिर टूरिस्ट अच्छी तादाद में आ रहे हैं, तो हमारा थोड़ा काम चल रहा है। आने वाले समय में और टूरिस्ट आने की उम्मीद है, जिससे एक बार फिर हमारा व्यापार दोबारा पटरी पर लौटने की उम्मीद है।

