उत्तराखंड में राजा आए या ना आए लेकिन मां नंदा की राजजात होकर रहेगी, महापंचायत का बड़ा फैसला………
देहरादून: चमोली जिले के नंदानगर विकासखंड में हाल ही में आयोजित एक बड़ी महापंचायत में नंदा देवी की **बड़ी जात यात्रा** (राजजात) को निर्धारित समय पर ही आयोजित करने का दृढ़ फैसला लिया गया है। बैठक में क्षेत्र के प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि, विभिन्न सामाजिक संस्थाएं, मंदिर प्रबंधन समितियां, विद्वानगण, महिला समूह और बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी शामिल हुए। मुख्य उद्देश्य आगामी 12 वर्षीय अंतराल वाली इस यात्रा को परंपरागत रूप से, सुव्यवस्थित और पूर्ण भक्ति भाव के साथ संपन्न कराने पर विचार-मंथन करना था।
सभी प्रतिभागियों ने एकमत से इस बात पर जोर दिया कि नंदा देवी राजजात मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, अपितु उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत, जन आस्था तथा प्राचीन रीति-रिवाजों का जीवंत प्रतीक है। इसे अपनी मूल भावना और गरिमा के साथ ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
महापंचायत ने उन मतों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया, जिनमें यात्रा स्थगित करने या न कराने का सुझाव दिया गया था। ऐसे प्रस्तावों को कुछ एनजीओ या व्यक्तिगत राय करार देते हुए खारिज किया गया। साथ ही, बसंत पंचमी के पावन अवसर पर **दीनपटा** (पवित्र जुलूस) निकालने का निर्णय लिया गया, जिसकी शुरुआत सिद्धपीठ नंदा देवी मंदिर, कुरुड़ से होगी।
मजबूत संदेश और संगठनात्मक ढांचा।
बैठक में स्पष्ट संदेश दिया गया कि नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा अवश्य होगी, चाहे कोई भी बाधा आए। यात्रा की सफलता के लिए एक व्यापक आयोजन समिति का गठन भी किया गया है। इसमें अध्यक्ष के रूप में हरेंद्र सिंह रावत, उपाध्यक्षों में सुखबीर रौतेला और नरेश गौड़, सचिव अशोक गौड़ तथा कोषाध्यक्ष प्रकाश गौड़ को जिम्मेदारी सौंपी गई है। संरक्षक मंडल में जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह बिष्ट और नंदानगर ब्लॉक प्रमुख को शामिल किया गया है। इसके अलावा, नंदानगर, देवाल, थराली, नारायणबगड़, कर्णप्रयाग, जोशीमठ तथा दशोली क्षेत्रों से जुड़ी सभी देव डोलियों के प्रमुखों को भी व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
नंदा देवी राजजात यात्रा का संक्षिप्त परिचय, पौराणिक आधार और सांस्कृतिक महत्व।
नंदा देवी राजजात यात्रा (स्थानीय भाषा में बड़ीजात के नाम से भी जानी जाती है) उत्तराखंड का एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन है, जो लगभग प्रत्येक 12 वर्षों में आयोजित होता है। यह हिमालयी क्षेत्र की सबसे कठिन पैदल यात्राओं में से एक मानी जाती है और लोकप्रिय रूप से ‘हिमालयी महाकुंभ’ कहा जाता है। यह न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि गढ़वाल-कुमाऊं की साझा सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला प्रमुख पर्व भी है।

