उत्तराखंड में हरीश रावत की नाराजगी का गहरा राज, चहेतों को कांग्रेस में नहीं लेने से खफा…….
देहरादून: पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने शनिवार को राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। उन्होंने ट्वीट कर 15 दिनों का “अर्जित अवकाश” घोषित किया—15 दिन राजनीतिक गतिविधियों और बयानों से दूर रहेंगे।
ठीक उसी दिन दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में भाजपा और बसपा के कई बड़े चेहरों ने पार्टी जॉइनिंग की।
पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, भीमलाल आर्य, नारायण पाल, रुड़की के पूर्व मेयर गौरव गोयल और अन्य शामिल हुए। लेकिन एक नाम गायब था—रामनगर के चर्चित नेता और हरीश रावत के करीबी संजय नेगी।
सूत्रों के मुताबिक, संजय नेगी को भी शामिल करने की तैयारी थी। ब्लॉक प्रमुख मंजू नेगी और उप-ज्येष्ठ प्रमुख संजय नेगी परिवार की रामनगर में मजबूत पकड़ है।
हरीश रावत लंबे समय से उन्हें अपना करीबी मानते रहे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में रामनगर सीट पर विद्रोही (बागी) गतिविधियों के दौरान भी नेगी परिवार ने रावत खेमे का साथ दिया था।
फिर भी नेगी को टिकट नहीं मिला और अब जॉइनिंग में भी दरवाजा बंद।
तहकीकात: कौन रोक रहा है नेगी को ?
पार्टी सूत्रों और स्थानीय कांग्रेस नेताओं से बातचीत से पता चला कि रामनगर से पूर्व विधायक रणजीत रावत ने नेगी के शामिल होने का विरोध किया।
रणजीत रावत भी रामनगर सीट पर दावा ठोक रहे हैं और 2027 के चुनाव में टिकट की दौड़ में हैं।
हरीश रावत और रणजीत रावत के बीच कुमाऊं मंडल में लंबे समय से गुटबाजी की खबरें रही हैं।
2022 में रामनगर सीट पर हरीश रावत को पहले नामांकित किया गया था, लेकिन बाद में सीट बदली गई और आंतरिक विद्रोह उभरा था।
अब वही पुरानी रणनीति दोहराई जा रही है—रणजीत रावत का “नहीं” ने नेगी को बाहर रख दिया।
एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता (नाम गोपनीय रखने की शर्त पर) ने बताया, “हरीश जी ने नेगी को अपना भाई माना है। रामनगर में नेगी परिवार का जनाधार हरीश रावत की ताकत रहा है।
जब पार्टी दिल्ली में नई भर्तियां कर रही है तो अपने वफादार को क्यों दरकिनार किया जा रहा है? यह सवाल हरीश जी के मन में है।”
नाराजगी की गहराई: न सिर्फ नेगी, बल्कि सम्मान की लड़ाई
हरीश रावत ने इस घटना को अपनी 60 साल की राजनीतिक यात्रा का “अर्जित अवकाश” बताया, लेकिन सियासी गलियारों में इसे खुली नाराजगी माना जा रहा है।
पिछले कुछ महीनों में हरीश रावत रामनगर में सक्रिय रहे—पदयात्रा निकाली, वन ग्रामों के मुद्दे उठाए और संजय नेगी के साथ मंच साझा किया।
अब जब पार्टी कुनबा बढ़ा रही है तो उनके करीबी को बाहर रखना उन्हें अपने प्रभाव को कम होते महसूस करा रहा है।
विश्लेषण की बात करें तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की नाराजगी नहीं है। उत्तराखंड कांग्रेस में दो बड़े गुट लंबे समय से सक्रिय हैं—एक हरीश रावत का कुमाऊं-केंद्रित खेमा और दूसरा अन्य क्षेत्रीय नेताओं का।
नई भर्तियां (ठुकराल, आर्य आदि) पार्टी को मजबूती दे रही हैं, लेकिन पुराने वफादारों को नजरअंदाज करने से आंतरिक कलह बढ़ रही है।
रणजीत रावत vs संजय नेगी की लड़ाई रामनगर सीट की टिकट को लेकर है, जो 2027 में कांग्रेस के लिए अहम हो सकती है।
अगर नेगी जैसे स्थानीय चेहरे नाराज हुए तो रामनगर में बागी ताकत फिर उभर सकती है।
रणनीति या विद्रोह ?
कुछ नेता इसे हरीश रावत की चतुर रणनीति मान रहे हैं—पार्टी पर दबाव बनाने का तरीका ताकि भविष्य में उनके करीबियों को प्राथमिकता मिले।
वहीं कुछ का कहना है कि यह असली असंतोष है। हरीश रावत ने पहले भी 2022 में राजनीतिक ब्रेक की घोषणा की थी, लेकिन वापसी की। अब 15 दिन का व्रत क्या मौन विरोध है या पार्टी को संदेश?
पार्टी हाईकमान इस मुद्दे पर चुप है, लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि दिल्ली में जॉइनिंग के बाद हरीश रावत की नाराजगी पर चर्चा हुई।
कांग्रेस को 2027 में भाजपा की हैट्रिक रोकनी है, इसलिए आंतरिक एकता जरूरी है। अगर रावत खेमा नाराज रहा तो नुकसान पार्टी को ही होगा।
रामनगर से शुरू हुई यह कहानी अब पूरे उत्तराखंड कांग्रेस की सियासी तस्वीर बन गई है। संजय नेगी को कांग्रेस में न लेने का फैसला सिर्फ एक नाम की अनदेखी नहीं, बल्कि वफादारी, गुटबाजी और टिकट की भविष्य की लड़ाई का प्रतीक है।
हरीश रावत की 15 दिन की चुप्पी पार्टी के लिए चेतावनी है। क्या हाईकमान नेगी को जल्द शामिल कर रावत को मनाएगा या फिर पुरानी कलह नई शक्ल लेगी? तहकीकात जारी है—2027 के मैदान में इसका असर साफ दिखेगा।

