उत्तराखंड में CAMPA कोष का अधूरा उपयोग: वित्तीय वर्ष में 63% राशि अभी बाकी, विभाग की कार्यशैली पर उठे सवाल………..
देहरादून: उत्तराखंड के वन विभाग को पर्यावरण संरक्षण और वन विकास से संबंधित गतिविधियों के लिए केंद्र से प्राप्त होने वाली विशेष निधि CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) के प्रबंधन में चुनौतियां सामने आ रही हैं। राज्य का लगभग 70% क्षेत्र जंगलों से घिरा होने के कारण यहां वन प्रबंधन की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है। पेड़ लगाने, जंगली जानवरों की सुरक्षा, मनुष्य-वन्यजीव टकराव को नियंत्रित करने, जंगलों में बुनियादी सुविधाओं के निर्माण और पर्यावरण पर्यटन को बढ़ावा देने जैसी योजनाओं के लिए प्रतिवर्ष पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। हालांकि, हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि इस निधि का उचित तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
वन विभाग द्वारा CAMPA निधि के खर्च में कमी: CAMPA के अंतर्गत वनों के रखरखाव और विस्तार से जुड़ी परियोजनाओं के लिए राज्यों को समर्पित कोष प्रदान किया जाता है, ताकि धन की कमी से कोई काम प्रभावित न हो। लेकिन उत्तराखंड में प्रशासनिक ढिलाई इस कोष के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन रही है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में खर्च का स्तर चिंताजनक: चालू वित्तीय वर्ष के नौ महीनों के बाद भी विभाग CAMPA निधि का केवल 36.79% हिस्सा ही व्यय कर सका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य को इस वर्ष कुल 25,336.69 लाख रुपये (लगभग 253 करोड़ रुपये) आवंटित किए गए थे। इनमें से अब तक मात्र 9,321.43 लाख रुपये (करीब 93 करोड़ रुपये) का उपयोग हुआ है।
शेष तीन महीनों में 60% से अधिक राशि व्यय करने की चुनौती: वर्ष के अंतिम तीन महीनों में विभाग को बची हुई 60% से ज्यादा राशि का उपयोग करना होगा। नौ महीनों में 40% से कम खर्च होने की स्थिति में इतनी बड़ी रकम को इतने कम समय में खर्च करना वर्तमान परिस्थितियों में असंभव प्रतीत होता है।
विभागीय मंत्री की समीक्षा और अधिकारियों का पक्ष: इस मुद्दे पर विभागीय मंत्री सुबोध उनियाल ने व्यय की समीक्षा की और अधिकारियों को गति बढ़ाने के आदेश दिए। हालांकि, ईटीवी भारत से चर्चा में उन्होंने विभाग की धीमी गति का बचाव करते हुए कहा कि आगामी समय में व्यय की गति में सुधार होगा।
क्षेत्रीय स्तर पर व्यय के आंकड़े भी कमजोर: विभिन्न क्षेत्रों के आंकड़े विभाग की दक्षता पर संदेह पैदा करते हैं। गढ़वाल क्षेत्र के लिए 135 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिनमें से 53 करोड़ रुपये (39.13%) व्यय हुए। कुमाऊं क्षेत्र में 74 करोड़ रुपये में से 25 करोड़ रुपये (34.24%) का उपयोग हुआ। वन्यजीव संरक्षण के लिए 31 करोड़ रुपये में से 12 करोड़ रुपये (41%) खर्च किए गए। अनुसंधान क्षेत्र में 3 करोड़ रुपये में से केवल 70 लाख रुपये (22%) व्यय हुए। अन्य प्रशासनिक इकाइयों के लिए 9 करोड़ रुपये में से 1 करोड़ 24 लाख रुपये (14%) का इस्तेमाल हुआ।
वन्यजीव क्षेत्रों में कॉर्बेट का प्रदर्शन सबसे कमजोर: वन्यजीव जोनों में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, जहां 7 करोड़ 13 लाख रुपये में से मात्र 1 करोड़ 30 लाख रुपये (18.32%) व्यय हुए। इसके विपरीत, राजाजी टाइगर रिजर्व में 58.29% राशि का उपयोग हुआ।
सर्कल स्तर पर यमुना और उत्तर कुमाऊं की स्थिति निराशाजनक: सर्कल स्तर पर गढ़वाल के यमुना सर्कल में आवंटित राशि का केवल 29.77% व्यय हुआ, जबकि कुमाऊं के उत्तर कुमाऊं सर्कल में यह आंकड़ा 33.8% रहा।
प्रमुख वन संरक्षक का दावा: इस विषय पर विभाग के प्रमुख और प्रमुख वन संरक्षक (HOFF) रंजन कुमार मिश्रा ने कहा कि विभाग व्यय को लेकर प्रतिबद्ध है। शेष तीन महीनों में पूरी राशि व्यय कर ली जाएगी।
व्यय की योजना पर स्पष्ट उत्तर नहीं: जब उनसे पूछा गया कि नौ महीनों में अधूरा रह गया व्यय तीन महीनों में कैसे पूरा होगा, तो कोई स्पष्ट या तर्कपूर्ण उत्तर नहीं मिला।
विभाग की जटिलताओं का हवाला: अधिकारियों पर दबाव बनाने के बजाय विभाग प्रक्रियागत जटिलताओं का जिक्र कर रहा है, जिससे भविष्य में समयबद्ध व्यय सुनिश्चित होने की संभावना कम लगती है। यदि केंद्र से प्राप्त यह महत्वपूर्ण कोष व्यर्थ हो जाता है, तो इसकी जवाबदेही किस पर होगी?
पिछले वर्षों में भी व्यय में कमी: यह पहली बार नहीं है जब विभाग CAMPA निधि का पूर्ण उपयोग करने में विफल रहा। वित्तीय वर्ष 2024-25 में 400 करोड़ रुपये में से कम से कम 25 से 30 करोड़ रुपये (ब्याज सहित अधिक) व्यय नहीं हो सके। चालू वर्ष में स्थिति और गंभीर है, और पूर्ण व्यय संभव नहीं दिखता।
कोष व्यर्थ होने पर भविष्य का आवंटन प्रभावित: यदि वित्तीय वर्ष के अंत तक राशि व्यय नहीं हुई, तो वह व्यर्थ हो जाती है और राज्य को पूरा लाभ नहीं मिलता। सरकारी प्रक्रियाओं की औपचारिकताएं समय पर व्यय में बाधा बनती हैं। इससे भी महत्वपूर्ण, अगले वर्ष के प्रस्ताव में पिछले प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए केंद्र द्वारा कटौती की संभावना रहती है।

