उत्तराखंड में मशीन नहीं, कपड़े से छानकर बनता है खास गुलाल, राजधानी की इस जगह होली में बन जाती है बेहद खास………
देहरादून: मशीनी रंगों और केमिकल के दौर में देहरादून का दर्शनी गेट आज भी 58 साल पुरानी परंपरा को जिंदा रखे हुए है. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आने वाले बैजनाथ और उनका परिवार हर साल होली से पहले यहां ‘हाथों के हुनर’ से प्राकृतिक गुलाल तैयार करता है. अरारोट और फूड कलर्स की मदद से बनने वाला यह गुलाल इतना सुरक्षित है कि इसे आंखों और त्वचा के लिए वरदान माना जाता है. बनारस की प्राचीन तकनीक से तैयार होने वाले इस खास गुलाल की मांग अब देहरादून ही नहीं, बल्कि दिल्ली, मुंबई और कोलकाता तक पहुंच गई है. जानिए कैसे कड़ी मेहनत से तैयार होता है यह केमिकल फ्री रंग और क्या है इसकी खासियत।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आज भी परंपराओं का रंग उतना ही गहरा है, जितना दशकों पहले हुआ करता था. जहां आज बाजार मशीनों से बने केमिकल वाले रंगों से भरे पड़े हैं, वहीं देहरादून में एक ऐसी जगह है जहां होली के रंग आज भी ‘हाथों के हुनर’ से तैयार होते हैं. हम बात कर रहे हैं देहरादून के झंडे बाजार के नजदीक स्थित दर्शनी गेट की. यहां हर साल उत्तर प्रदेश के रहने वाले बुजुर्ग बैजनाथ होली से कुछ दिन पहले अपने परिवार के साथ आते हैं और अरारोट व फूड कलर्स (खाने वाले रंगों) की मदद से खास गुलाल तैयार करते हैं. बैजनाथ की कोशिश रहती है कि वे लोगों को पूरी तरह से केमिकल फ्री और प्राकृतिक रंग उपलब्ध करवा सकें।
30 सालों से हाथों के हुनर से गुलाल बना रहे हैं पवन
कपड़े से हाथों की मदद से रंग तैयार करने वाले पवन जायसवाल बताते हैं कि वह महज 10 साल की उम्र से ही हर साल होली से पहले देहरादून आ रहे हैं. आज उन्हें यहां आते हुए 30 साल हो चुके हैं और उनके परिवार के कई लोग इस काम में जुटे हुए हैं. पवन के अनुसार, वे गुलाल बनाने के लिए अरारोट और मिठाइयों में इस्तेमाल होने वाले रंगों का प्रयोग करते हैं. उनका मानना है कि होली प्यार और खुशियों का त्योहार है, इसलिए रंग किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाने चाहिए. त्वचा और आंखों की सुरक्षा के लिए वे पूरी तरह से प्राकृतिक गुलाल तैयार करते हैं. यह हुनर उन्होंने अपने पिता से सीखा है और आज भी उसी शुद्धता के साथ इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
मशीनों को छोड़ हाथ की मेहनत पर भरोसा
पवन बताते हैं कि मशीन से रंग बहुत जल्दी तैयार हो जाते हैं, लेकिन वे आज भी पारंपरिक तरीके का ही इस्तेमाल करते हैं. वे रंग को कपड़े से बार-बार छानकर बहुत महीन निकालते हैं ताकि उसमें किसी भी तरह की गुठलियां न पड़ें. इस प्रक्रिया से रंग में मौजूद सभी तरह की अशुद्धियां और हानिकारक कण बाहर निकल जाते हैं. यही वजह है कि इन रंगों को तैयार करने में बहुत मेहनत और समय लगता है. पवन के अनुसार, एक बोरी गुलाल तैयार करने में करीब 2 घंटे का समय लगता है. उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि ग्राहक हर साल उनसे भारी मात्रा में गुलाल लेकर जाते हैं. उनके रंग न सिर्फ देहरादून, बल्कि विकासनगर, ऋषिकेश और पहाड़ों के दूर-दराज इलाकों तक मशहूर हैं।
1968 से बनारस की तकनीक को देहरादून ला रहे हैं बैजनाथ
बैजनाथ बताते हैं कि वह साल 1968 से लगातार देहरादून आ रहे हैं और अपने साथियों के साथ रंग बना रहे हैं. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के रहने वाले बैजनाथ ने गुलाल बनाने का यह खास तरीका बनारस के एक दोस्त से सीखा था. उन्होंने बनारस जाकर इस प्राकृतिक तकनीक में महारत हासिल की और बाद में अपने बच्चों को भी सिखाया. बैजनाथ के अनुसार, वृंदावन की प्रसिद्ध होली में भी इसी तरह के रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. आज देहरादून से बने उनके ये रंग दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों तक भेजे जाते हैं।
प्रदूषण और बदलते मौसम का असर
बैजनाथ ने देहरादून के बदलते स्वरूप पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि पहले देहरादून में इतनी भीड़, ज्यादा घर और गर्म मौसम नहीं हुआ करता था, लेकिन अब यहां का माहौल काफी बदल गया है. इसके बावजूद वे अपनी परंपरा को नहीं छोड़ रहे हैं. यदि आप भी इस होली पर अपनी त्वचा को सुरक्षित रखना चाहते हैं और केमिकल फ्री गुलाल खरीदना चाहते हैं, तो देहरादून के दर्शनी गेट पर आ सकते हैं. यहां आपको मात्र 100 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेहतरीन और शुद्ध प्राकृतिक रंग मिल जाएंगे।

