उत्तराखंड में लाखों का पैकेज छोड़ बागेश्वर की विजया कोरंगा पहाड़ पर लौट कर रही ग्रामीणों की सेवा, बनीं जिला पंचायत सदस्य………
बागेश्वर: बेहतर भविष्य और रोजगार की तलाश में पहाड़ से बड़ी संख्या में युवा महानगरों का रुख करते हैं, लेकिन बागेश्वर की विजया कोरंगा ने इसका उलटा रास्ता चुना। देहरादून में छह लाख पैकेज वाली कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर विजया अपने पहाड़ लौटीं और अब ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर जनसेवा के मैदान में सक्रिय हैं। वर्तमान में वह बागेश्वर जिला पंचायत के शामा क्षेत्र यानी वार्ड संख्या 10 से निर्वाचित सदस्य हैं।
विजया ने बताया कि उनका मकसद पहाड़ में रहकर ग्रामीणों और युवाओं के लिए काम करना है। क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, महिला सशक्तिकरण और अन्य जनहित के मुद्दों को लेकर वह लगातार आवाज उठा रही हैं। स्थानीय शराब की दुकान के विरोध समेत कई मुद्दों पर भी उन्होंने ग्रामीणों के साथ खड़े होकर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि पहाड़ के युवाओं को यदि अपने क्षेत्र में ही बेहतर अवसर मिलें तो पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है।
विजया की शुरुआती पढ़ाई शामा क्षेत्र में हुई। उन्होंने शामा इंटर कॉलेज से हाईस्कूल की पढ़ाई की, जबकि इंटरमीडिएट की शिक्षा विवेकानंद विद्या मंदिर से पूरी की। इसके बाद उन्होंने हल्द्वानी के आम्रपाली संस्थान से स्नातक की पढ़ाई की। आगे उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय से मेडिकल क्षेत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद करीब चार साल तक उन्होंने मेडिकल लाइन में काम किया। इसके बाद उन्होंने देहरादून में सरसा ग्रुप ऑफ कंपनीज में नौकरी की, जहां उन्हें करीब छह लाख रुपये सालाना का पैकेज मिल रहा था। अच्छी नौकरी और शहर की सुविधाओं के बावजूद विजया ने पहाड़ लौटने का फैसला किया। उनका कहना है कि वर्तमान में वह अपने क्षेत्र के लोगों के लिए तन, मन और धन से काम कर रही हैं।
भूपेंद्र सिंह कोरंगा का मिला लगातार साथ।
विजया के इस सफर में उनके सहयोगी और सामाजिक कार्यकर्ता भूपेंद्र सिंह कोरंगा की भी अहम भूमिका रही है। विजया के अनुसार भूपेंद्र स्कूल के समय से ही उनका सहयोग करते आ रहे हैं, और पहाड़ लौटने के फैसले में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों लंबे समय से सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर साथ काम कर रहे हैं। भूपेंद्र सिंह कोरंगा ने विजया के फैसले को साहसिक कदम बताते हुए कहा कि उन्होंने महानगर की सुख-सुविधाओं और अच्छी नौकरी को छोड़कर पहाड़ का संघर्ष चुना है. उनके अनुसार विजया महिला सशक्तिकरण की मिसाल हैं, और जनहित के मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता अन्य महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा है।
भविष्य में भी सामाजिक मुद्दों पर काम करने का संकल्प।
विजया और भूपेंद्र की सगाई कुमाऊंनी रीति-रिवाज के अनुसार हो चुकी है, और भविष्य में दोनों विवाह करने वाले हैं। दोनों का कहना है कि निजी जीवन के साथ-साथ वे सामाजिक और जनसरोकार के मुद्दों पर भी काम जारी रखेंगे। विजया का मानना है कि राजनीति उनके लिए सिर्फ पद हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों की समस्याओं को उठाने और समाधान की दिशा में काम करने का जरिया है।
उनका कहना है कि यदि जनता भविष्य में भी उन्हें अवसर देती है, तो वह बड़े स्तर पर जनसेवा और राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार रहेंगी। कॉर्पोरेट नौकरी से लेकर जिला पंचायत तक का उनका सफर यह संदेश देता है कि पहाड़ में रहकर भी बदलाव की कोशिश की जा सकती है, और अपने क्षेत्र के लिए कुछ करने का जज्बा हो तो सुविधाओं से ज्यादा समाज की जरूरतों को प्राथमिकता दी जा सकती है।

